चंडीगढ़, 25 जुलाई
हरियाणा में 255 सहायक जिला न्यायवादी — असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (ADA) हेतु जारी चयन-प्रक्रिया को लेकर एक वैधानिक एवं प्रशासनिक विवाद सामने आया है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट और विधि-विधायी मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने आज बताया है कि हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) द्वारा उपरोक्त पदों के लिए चयन प्रक्रिया के दौरान लगातार प्रॉसिक्यूशन डिपार्टमेंट का उल्लेख कर रहा है, जिसका राज्य सरकार के संवैधानिक ढांचे में कोई विधिक अस्तित्व ही नहीं है।
इस संबंध में एडवोकेट हेमंत ने आज प्रदेश के राज्यपाल प्रो. आशिम कुमार घोष, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी (जिनके पास प्रदेश का गृह विभाग भी है), HPSC के चेयरमैन आलोक वर्मा एवं आयोग के चारों सदस्यों, गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ए.सी.एस.) सुधीर राजपाल एवं विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, एडवोकेट जनरल, लोकायुक्त, हरियाणा राज्य विधि आयोग के चेयरमैन, लीगल रिमेम्ब्रांसर (LR) सहित अन्य उच्च प्रशासनिक प्राधिकारियों को विस्तृत कानूनी ज्ञापन भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।
HPSC की विज्ञप्तियों से लेकर परीक्षा परिणाम तक एक ही ‘गलती‘
ज्ञापन में लिखा गया है कि विज्ञापन संख्या 18/2025, भर्ती संबंधी सभी नोटिस, परीक्षा दस्तावेज तथा 24 जुलाई 2026 को घोषित स्क्रीनिंग टेस्ट परिणाम तक में “Prosecution Department” का उल्लेख किया गया है।
एडवोकेट हेमंत का कहना है कि यह केवल लिपिकीय (क्लेरिकल) लापरवाही नहीं, बल्कि लगातार दोहराई जा रही वैधानिक और प्रशासनिक त्रुटि है।
हरियाणा में ‘प्रॉसिक्यूशन डिपार्टमेंट‘ नाम का कोई विभाग नहीं
हेमंत का कहना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 166 के तहत हरियाणा के राज्यपाल द्वारा बनाए गए हरियाणा सरकार कार्य आबंटन नियमवाली ( Business of the Haryana Government (Allocation) Rules) 1974 में राज्य सरकार के प्रत्येक विभाग का स्पष्ट उल्लेख है, लेकिन उसमें कहीं भी “Prosecution Department” नामक किसी विभाग का उल्लेख नहीं है।
ज्ञापन के अनुसार वर्तमान में हरियाणा में Prosecution (अभियोजन) आधिकारिक तौर पर प्रदेश के गृह विभाग के अधीन कार्यरत एक निदेशालय (Directorate) है। इससे पहले यह न्याय प्रशासन (Administration of Justice Department) के अधीन कार्य करता था, जिसे वर्ष 2025 में गृह विभाग को स्थानांतरित किया गया।
हेमंत ने लिखा है कि “एक निदेशालय किसी विभाग के अधीन तो कार्य कर सकता है, लेकिन कोई विभाग किसी दूसरे विभाग के अधीन नहीं हो सकता। इसलिए ‘Home Department के अधीन Prosecution Department’ कहना वैधानिक और प्रशासनिक दृष्टि से असंभव और विधिक रूप से असंगत है।”
BNSS, 2023 भी केवल ‘Directorate of Prosecution’ को मान्यता देता है
ज्ञापन में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 20(3) का हवाला देते हुए कहा गया है कि संसद ने प्रत्येक राज्य में गृह विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में केवल “Directorate of Prosecution” स्थापित करने का ही प्रावधान किया है।
एडवोकेट ने बताया कि इससे पूर्व दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 25A में भी यही व्यवस्था थी। अर्थात लगभग दो दशकों से संसद ने केवल Directorate of Prosecution को ही विधिक मान्यता दी है, “Prosecution Department” को नहीं।
“कार्यपालिका के आदेश से नया सरकारी विभाग नहीं बनाया जा सकता”
ज्ञापन में यह भी लिखा गया है कि यदि 1981 के किसी कार्यपालिका संबंधी आदेश में “Prosecution Department” शब्द का प्रयोग किया गया हो, तब भी उससे किसी नए सरकारी विभाग का संवैधानिक अस्तित्व नहीं बन जाता।
हेमंत के अनुसार सरकारी विभागों का सृजन, नामकरण अथवा पुनर्गठन केवल अनुच्छेद 166 के अंतर्गत बनाए गए Business Allocation Rules में संशोधन के माध्यम से ही संभव है।
उन्होंने कहा कि कोई कार्यकारी आदेश, कार्यालय ज्ञापन या विभागीय पत्राचार संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त किसी विभाग का विकल्प नहीं बन सकता।
तीन अलग-अलग कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप
प्रतिवेदन में आरोप लगाया गया है कि “Prosecution Department” शब्द का निरंतर प्रयोग निम्नलिखित तीन विधिक व्यवस्थाओं का उल्लंघन है—
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 166(2) एवं 166(3);
- Business of the Haryana Government (Allocation) Rules, 1974;
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 20(3) (पूर्व में CrPC की धारा 25A)।
एडवोकेट हेमंत का कहना है कि अब यह विवाद केवल शब्दों तक सीमित नहीं रह गया है, क्योंकि यही शब्दावली भर्ती विज्ञापनों, परीक्षा सामग्री, विभागीय पत्राचार तथा आधिकारिक परीक्षा परिणामों में भी लगातार प्रयुक्त हो रही है।
प्रदेश सरकार और HPSC से क्या मांगी गई कार्रवाई?
ज्ञापन में अपील की गई है कि—
- राज्य सरकार औपचारिक रूप से घोषित करे कि “Prosecution Department” नाम का कोई संवैधानिक या वैधानिक विभाग अस्तित्व में नहीं है।
- HPSC को निर्देश दिए जाएं कि भर्ती से जुड़े सभी दस्तावेजों में “Directorate of Prosecution” शब्द का ही प्रयोग किया जाए।
- राज्य के सभी विभागों, आयोगों, बोर्डों एवं वैधानिक संस्थाओं को केवल संवैधानिक रूप से मान्य नामावली अपनाने के निर्देश जारी किए जाएं।
- 1981 के कार्यपालिका संबंधी आदेशों की अनुच्छेद 166 के आलोक में विधिक वैधता की भी जांच कराई जाए।
“यह केवल शब्दों का नहीं, संवैधानिक शासन का प्रश्न”
हेमंत ने कहा कि यह मामला किसी सामान्य शब्दगत त्रुटि का नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन, विधिक अनुशासन और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं द्वारा जारी प्रत्येक आधिकारिक दस्तावेज में सरकारी संस्थाओं की विधिक पहचान का सही और सटीक उल्लेख होना अनिवार्य है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि राज्य सरकार और संबंधित संवैधानिक प्राधिकरण शीघ्र हस्तक्षेप कर इस त्रुटि का विधिसम्मत समाधान सुनिश्चित करेंगे।





