फिल्टर के पीछे खोती पहचान

By Sahab Ram
On: April 23, 2026 12:31 PM
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सोशल मीडिया और लड़कियों की आत्मछवि का संकट

डॉ. प्रियंका सौरभ

सुनो लड़कियों—यह कोई भावुक अपील नहीं, बल्कि एक ज़रूरी सच है। सुंदर दिखने की इस दौड़ में तुम कहीं खुद को खो न बैठो, यह चिंता अब व्यक्तिगत नहीं रही, यह एक सामाजिक संकट बनती जा रही है। आज का समय ऐसा है जहाँ आईना हमारे कमरे की दीवार पर नहीं, बल्कि हमारे मोबाइल की स्क्रीन में बसता है। और यह आईना सच्चाई नहीं दिखाता, बल्कि वह दिखाता है जो दिखाना चाहता है। इस आभासी दुनिया में सुंदरता अब स्वाभाविक नहीं, बल्कि एक प्रोजेक्ट है—जिसे एडिट किया जाता है, फिल्टर लगाया जाता है, और लाइक्स व व्यूज़ के पैमाने पर नापा जाता है।

यह मान लेना गलत होगा कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम है। यह अब एक मनोवैज्ञानिक संरचना बन चुका है, जो हमारी सोच, हमारी पसंद, हमारे आत्मविश्वास और हमारी पहचान को धीरे-धीरे आकार दे रहा है। खासकर युवतियों के लिए यह एक ऐसा दबाव रचता है, जिसमें वे अनजाने में खुद को किसी और के साँचे में ढालने लगती हैं। हर दिन किसी और की “परफेक्ट” तस्वीर देखकर अपने चेहरे में कमी ढूंढना, हर स्टोरी के बाद यह सोचना कि कितने लोगों ने देखा, कितनों ने तारीफ की—यह सब एक खतरनाक आदत में बदलता जा रहा है।

वैलिडेशन की यह भूख बहुत सूक्ष्म होती है। शुरुआत में यह सामान्य लगती है—थोड़ी सी तारीफ, कुछ अच्छे कमेंट्स, कुछ लाइक्स। लेकिन धीरे-धीरे यही ज़रूरत बन जाती है। जब तारीफ नहीं मिलती, तो बेचैनी होती है, खुद पर संदेह होता है, और आत्मसम्मान डगमगाने लगता है। यह वही क्षण है जब एक लड़की, जो भीतर से मजबूत और आत्मनिर्भर हो सकती थी, बाहरी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर होने लगती है। यह निर्भरता मानसिक थकान और अवसाद की ओर ले जाती है, लेकिन विडंबना यह है कि यह सब एक मुस्कुराती हुई तस्वीर के पीछे छुपा रहता है।

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सोशल मीडिया पर जो दिखता है, वह पूरा सच नहीं होता। यहाँ हर कोई अपने जीवन का सबसे अच्छा हिस्सा ही दिखाता है। कोई अपने अकेलेपन की तस्वीर नहीं डालता, कोई अपने डर या असफलता को सार्वजनिक नहीं करता। इसलिए जब तुम किसी को हमेशा खुश, प्रेम में डूबा या सफल देखती हो, तो यह समझना ज़रूरी है कि वह पूरी कहानी नहीं है। यह केवल एक चुना हुआ फ्रेम है, जिसमें बाकी की सच्चाई जानबूझकर काट दी गई है।

सबसे बड़ा खतरा यह है कि इस आभासी तुलना के कारण तुम खुद को कम आंकने लगती हो। तुम्हें लगता है कि शायद तुम उतनी सुंदर नहीं, उतनी खुश नहीं, उतनी सफल नहीं। जबकि सच्चाई यह है कि तुम अपनी जगह पूरी हो। तुम्हारी सादगी, तुम्हारी सोच, तुम्हारा स्वभाव—ये सब तुम्हें अद्वितीय बनाते हैं। लेकिन जब तुम किसी और की तरह बनने की कोशिश करती हो, तो तुम अपनी ही पहचान को कमजोर करती हो।

आज की दुनिया में “ट्रेंड” एक नया धर्म बन चुका है। जो ट्रेंड में है, वही सही माना जाता है। लेकिन हर ट्रेंड तुम्हारे लिए नहीं बना होता। कई बार ये ट्रेंड्स तुम्हारी सेहत, तुम्हारे आत्मसम्मान और तुम्हारी मानसिक शांति पर भारी पड़ते हैं। अजीब-अजीब ब्यूटी स्टैंडर्ड्स, अस्वाभाविक लाइफस्टाइल, और दिखावे की आदत—ये सब धीरे-धीरे तुम्हें उस दिशा में ले जाते हैं जहाँ तुम अपने असली रूप से दूर होती जाती हो।

यह भी सच है कि सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले हैं। लेकिन जब यह अभिव्यक्ति तुलना और प्रतिस्पर्धा में बदल जाती है, तो यह अपनी सकारात्मकता खो देती है। जब हर पोस्ट एक प्रदर्शन बन जाए, हर तस्वीर एक संदेश बन जाए कि “मैं खुश हूँ”, तो यह स्वाभाविक जीवन नहीं रह जाता, बल्कि एक अभिनय बन जाता है। और लगातार अभिनय करना किसी भी इंसान को थका देता है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे जरूरी है खुद से जुड़ाव। यह समझना कि तुम्हारी असली कीमत लाइक्स और कमेंट्स से तय नहीं होती। तुम्हारी पहचान किसी ट्रेंड या फिल्टर से बड़ी है। तुम्हारी सादगी, तुम्हारी ईमानदारी, और तुम्हारा आत्मसम्मान—यही तुम्हारी असली ताकत है। यह जरूरी नहीं कि तुम हर दिन अपनी ज़िंदगी को साबित करो। यह भी जरूरी नहीं कि हर खुशी को दिखाया जाए और हर दुख को छुपाया जाए।

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असल ज़िंदगी उस छह इंच की स्क्रीन से कहीं बड़ी है। वहाँ रिश्ते हैं, जो बिना फिल्टर के चलते हैं। वहाँ भावनाएँ हैं, जो बिना एडिट के सामने आती हैं। वहाँ संघर्ष है, जो सिखाता है, और वहाँ सुकून है, जो बिना किसी लाइक के भी संतोष देता है। लेकिन जब हम इस असली दुनिया से ज्यादा समय उस आभासी दुनिया में बिताने लगते हैं, तो धीरे-धीरे हमारा संतुलन बिगड़ने लगता है।

यह समय है रुककर सोचने का। यह पूछने का कि क्या हम सच में जी रहे हैं, या सिर्फ दिखा रहे हैं कि हम जी रहे हैं। क्या हमारी खुशी सच्ची है, या केवल एक पोस्ट के लिए बनाई गई है। यह सवाल आसान नहीं हैं, लेकिन इनका सामना करना जरूरी है।

तुम्हें यह तय करना होगा कि तुम कैसी ज़िंदगी चाहती हो—एक ऐसी जो दूसरों की नजरों में परफेक्ट लगे, या एक ऐसी जो तुम्हें भीतर से सुकून दे। क्योंकि अंत में वही मायने रखता है जो तुम अपने बारे में महसूस करती हो, न कि दुनिया तुम्हें कैसे देखती है।

सादगी कोई कमी नहीं है, यह एक शक्ति है। आज के इस दिखावे के दौर में सादा रहना, खुद जैसा रहना, सबसे बड़ा साहस है। एक साधारण सी कुर्ती, एक छोटी सी बिंदी, और एक सच्ची मुस्कान—ये किसी भी महंगे मेकअप या ट्रेंड से ज्यादा खूबसूरत हो सकते हैं, अगर उनमें आत्मविश्वास और आत्मस्वीकृति हो।

खुद से प्रेम करना सीखो। यह कोई क्लिशे बात नहीं, बल्कि एक मानसिक आवश्यकता है। जब तुम खुद को स्वीकार करती हो, तो तुम्हें किसी और की स्वीकृति की जरूरत नहीं रहती। तुम दूसरों की खुशी देखकर खुश हो सकती हो, बिना खुद को कम समझे। तुम अपनी असफलताओं को भी सहजता से स्वीकार कर सकती हो, क्योंकि तुम्हें पता होता है कि तुम्हारी कीमत केवल सफलताओं से नहीं तय होती।

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और कभी-कभी, इस शोर से दूर जाना भी जरूरी है। एक रात अकेले बैठना, अपने विचारों के साथ समय बिताना, कोई अच्छा गीत सुनना—यह सब तुम्हें खुद से जोड़ता है। यह तुम्हें याद दिलाता है कि तुम केवल एक प्रोफाइल नहीं हो, बल्कि एक संवेदनशील, गहराई से भरी हुई इंसान हो।

इसलिए, अगली बार जब तुम सोशल मीडिया खोलो, तो यह याद रखना कि यह केवल एक हिस्सा है, पूरी ज़िंदगी नहीं। यह एक मंच है, लेकिन तुम्हारी असली कहानी इसके बाहर लिखी जाती है। वहाँ, जहाँ तुम बिना किसी डर के, बिना किसी तुलना के, बस अपने जैसी हो सकती हो।

सुंदर दिखने से ज्यादा जरूरी है सच्चा होना। और सच्चा वही होता है, जो खुद के करीब होता है। इसलिए, खुद से दूर मत जाओ। क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि तुम जैसी हो, वैसी ही रहो।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

Sahab Ram

हरियाणा मीडिया में पिछले 14 सालों से सक्रिय। Yuva Haryana, Khabar Fast, STV Haryana News, खबरें अभी तक, A1 Tehelka में अपनी सेवाएं दी। चौपाल टीवी डिजिटल मीडिया के संस्थापक ।

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